यह कहने में आता है कि एक सुदृढ़ राजनीतिक अवस्था एक अर्थव्यवस्था के लिए बोनस की तरह होती है। लेकिन मौजूदा हालात इस पंक्ति को नकारते दिख रहे हैं।
आज भारत में एक सुदृढ़ और बहुमत वाली सरकार है फिर भी आर्थिक सुस्ती और अर्थव्यवस्था की स्थिति चौंकाने वाली है। इसके पीछे का कारण सरकार के कुछ फैसले हैं जो कुछ जल्दबाजी में लिए गए और जिन्होंने अर्थव्यवस्था को काफी हद तक प्रभावित किया
आज भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 6.8 है जो 2013 ,2014 के बाद सबसे न्यूनतम है और GDP की तिमाही वृद्धि दर का आंकड़ा और भी चौंकाने वाला है। जनवरी से मार्च की पहली तिमाही में वृद्धि दर 5.8 थी जो अब इस तिमाही में घटकर 5 फीसदी पर आ गई है जो और भी चौंकाने वाली स्थिति है ।
हाल ही में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 2025 तक भारत की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा है और मौजूदा समय में भारत की अर्थव्यवस्था 2.75 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है । 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए भारत की जीडीपी दर को 8 से 9 फीसदी होना चाहिए पर वर्तमान में जीडीपी दर तो 6 पे आ गई है तो इस स्थिति को देखते हुए 5 trillionकी अर्थव्यवस्था का लक्ष्य पाना चांद तारे तोड़ने जैसा लग रहा है ।
इस संदर्भ में कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह असंभव है लेकिन कुछ का कहना है कि ” मोदी है तो मुमकिन है”
आज केंद्र में बहुमत वाली सरकार है तो सरकार हर निर्णय लेने हेतु स्वतंत्र है कोई राजनीतिक दबाव नहीं है फिर भी अर्थव्यवस्था संकट की ओर अग्रसर है सरकार को इसे समझना चाहिए तथा इसके समाधान के बारे में सोचना चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था गहरे भंवर में न जाए
आर्थिक मंदी के लक्षण
आर्थिक मंदी के शुरुआती लक्षणों में देखें तो gdp का गिरना निवेश में कमी आना बेरोजगारी बढ़ना आदि प्रमुख है जीडीपी वृद्धि दर 8 फीसदी से सीधी 6 फीसदी पर आ गई है और उससे भी खराब हालत जीडीपी की तिमाही वृद्धि दर का है
2019 की प्रथम तिमाही वृद्धि दर 5.8 रही जो कि पिछले 5 सालों में सबसे न्यूनतम है और दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा जो मंदी को दर्शाता है वह है बेरोजगारी का भारत की वर्तमान बेरोजगारी दर 6.1 है जो पिछले 43 सालो में सबसे उच्च स्तर पर है इसमें भी पुरुष बेरोजगारी दर 6.2 तथा महिला बेरोजगारी दर 5.7 है
और ऑटोमोबाइल सेक्टर शेयर मार्केट आदि का सुस्त पढ़ना आर्थिक मंदी की अवस्था को दर्शाता है ।

सरकार और अर्थव्यवस्था
2014 में जब श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली NDA सरकार आई तब से कुछ ऐसे फैसले लिए गए जो भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में शायद पहली बार लिए गए हो भले वो नोटबंदी हो या फिर जीएसटी हर फैसले ने अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया फिर हालिया government और भारतीय रिजर्व बैंक के मध्य का विवाद भी काफी चर्चा में रहा जिसने अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया
2018 में जब सरकार ने रिजर्व बैंक के रिजर्व फंड पर दृष्टि डाली तो सरकार और आरबीआई के मध्य विवाद शुरू हो गया और यह विवाद RBI के तत्कालीन गवर्नर उर्जित आर पटेल के इस्तीफे के साथ खत्म हुआ और सरकार ने अपने पसंद के अर्थशास्त्री श्री शक्ति कांत दास को रिजर्व बैंक का नया गवर्नर बनाया और रिजर्व बैंक के रिजर्व फंड के लिए विमल जलाना की अध्यक्षता वाली कमेटी बनाई गई और उसी जलाना कमेटी की सिफारिशों पर हाल के दिनों में आरबीआई ने केंद्र सरकार को एक बहुत बड़ी राशि हस्तांतरित की और यह आरबीआई द्वारा सरकार को आज तक सभी हस्तांतरित राशियों में सर्वाधिक है ।
भारतीय रिजर्व बैंक के रिजर्व फंड को विश्व संदर्भ में देखें तो भारत के रिजर्व बैंक के पास यह सर्वाधिक हैं और कई बड़े वैश्विक अर्थशास्त्री इसे भारतीय रिजर्व बैंक की ताकत के रूप में देखते हैं तो भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा हस्तांतरित राशि सरकार को मंदी की हालत से उबरने में सहायता कर पाती है या नहीं यह भविष्य की बात है पर यह भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा सरकार के लिए उठाया का एक बहुत बड़ा कदम है
क्या भारतीय रिजर्व बैंक सरकार के संकटमोचक बन पाएगी या नहीं ?
यह तो भविष्य में देखा जाएगा पर वर्तमान हालात ठीक नहीं है।
जब मंदी के शुरुआती आसार नजर आने लगे जैसे जीडीपी का घटना शेयर मार्केट का सुस्त होना ऑटोमोबाइल सेक्टर में मांग का घटना आदि मंदी के शुरुआती लक्षण थे पर सरकार हर बार इन्हें नकारती रही और आंकड़ों को छुपाती रही आज भी सरकार मंदी की हालत को स्वीकार नहीं रही है जो की अर्थव्यवस्था के लिए घातक है।
सरकार के वो फैसले जिन्होंने अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया
2014 में जब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली NDA सत्ता में आई तब से कुछ ऐसे फैसले लिए गए जिन्होंने अर्थव्यवस्था की रफ्तार को प्रभावित किया जैसे विमुद्रीकरण और जीएसटी
सरकार द्वाराअर्थव्यवस्था के क्षेत्र में लिए गए फैसले अर्थव्यवस्था को काफी हद तक प्रभावित करते हैं 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी की गई जिसका प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर आज तक बना हुआ है नोटबंदी के संदर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री व वित्त मंत्री डॉ मनमोहन सिंह का एक बयान काफी चर्चा में रहा था डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था की मैं नोटबंदी के उद्देश्य से सहमत हूं लेकिन यह बिना किसी पूर्व योजना के लागू की गई थी और यह भारत के अर्थ अर्थव्यवस्था के विकास को प्रभावित करेगी और इससे भारत की जीडीपी दर लगभग 2 से 3 फीसदी पर तक गिर जाने का अनुमान है तब तत्कालीन सरकार ने मनमोहन सिंह के इस बयान को अनसुना किया तथा यह कहा कि मनमोहन सिंह पार्टी के दबाव में यह बयान दे रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका मजाक भी बनाया और कहा की एक लंबे समय तक भारतीय अर्थ जगत में एक ही आदमी का दबदबा रहा था इस दौरान इतने घोटाले हुए पर डॉक्टर साहब पर एक भी दाग नहीं लगा उन्होंने चुटकी लेते हुए यह कहा था की बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाना तो कोई डॉक्टर साहब से सीखे
लेकिन मौजूदा स्थिति में डॉ मनमोहन सिंह के अनुमान सही साबित हो रहे हैं आज भारत की जीडीपी दर 2 से 3 फीसदी तक गिर गई है ।
1 जुलाई 2017 को पूरे भारत में माल सेवा कर जीएसटी को लागू किया गया जीएसटी का सर्वाधिक प्रभाव छोटे उद्यमियों पर पड़ा जीएसटी द्वारा प्रथम वर्ष में कर संग्रहण में भारी इजाफा हुआ लेकिन इस साल कर में बढ़ोतरी नहीं हुई जीएसटी को बिना किसी पूर्व योजना के लागू किया गया इसी कारण बार-बार इसका सरलीकरण किया जा रहा है और नियम बदले जा रहे हैं इस तरह सरकार के कई फैसला ने अर्थव्यवस्था को काफी प्रभावित किया
विमुद्रीकरण और मार सेवा कर का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
सामान्यता किसी देश की अर्थव्यवस्था निम्न चार घटकों पर निर्भर करती है इन्हें अर्थव्यवस्था के इंजन कहा जाता है।
(1) सार्वजनिक निवेश
(2) निजी निवेश
( 3) घरेलू उपभोग
(4) बाह्य उपभोग
वर्तमान स्थिति में आर्थिक अवस्था को देखें तो निजी निवेश और बाह्य उपभोग की स्थिति खराब है अर्थात निजी निवेश पर्याप्त नहीं है और बाह्य उपभोग में इतनी वृद्धि नहीं हो रही जितनी आवश्यक थी
निजी निवेश में कमी का कारण विमुद्रीकरण और जीएसटी है विमुद्रीकरण के कारण सारा का सारा पैसा बैंकों में आ गया और जीएसटी के कारण छोटे-छोटे उद्योग बंद हो गए इनके कारण अर्थव्यवस्था में निजी निवेश लगातार घटता गया ।
वर्तमान में देखें तो घरेलू उपभोग की स्थिति भी खराब है आज ऑटोमोबाइल सेक्टर से भारी संख्या में लोगों को निकाला जा रहा है यूं कहें ऑटोमोबाइल सेक्टर में भारी मंदी की अवस्थाएं है क्योंकि ऑटोमोबाइल सेक्टर में मांग घट रही है और इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ रहा है क्योंकि लोगों के पास पैसे नहीं है इस कारण उनकी मांग नहीं है।
बाह्य उपभोग को देखें तो यह 2014 मैं 314 अरब डॉलर था और 2017 -18 मैं 331 अरब डॉलर यू देखें तो 5 सालों में मात्र 17 अरब डॉलर की वृद्धि हुई जो कि बहुत ही कम है इस तरह बाह्य उपभोग जितना बढ़ना चाहिए था उतना नहीं बढ़ा कहीं ना कहीं नोटबंदी और जीएसटी ने इसे प्रभावित किया ।
सरकार द्वारा किए गए उपाय
सरकार आज भी मंदी की अवस्था को नकार रही है फिर भी सरकार द्वारा हाल ही में कुछ ऐसे कदम उठाए गए हैं जो अर्थव्यवस्था को गति दे सकते हैं जैसे भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट में कमी करना उसके तुरंत बाद ही एसबीआई द्वारा ब्याज दरों में कटौती करना इसके द्वारा लोगों को बैंकों से कम ब्याज दरों पर ऋण उपलब्ध होगा तथा लोगों के पास पैसा पहुंचेगा जिससे मांग बढ़ेगी और निवेश में वृद्धि होगी
हाल ही में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा जीएसटी का सरलीकरण किया गया जो वर्तमान अर्थव्यवस्था को गति देगा इस तरह सरकार द्वारा उठाए गए कदम अर्थव्यवस्था पर अनुकूल प्रभाव डालेंगे
वर्तमान सरकार को मंदी की अवस्था को स्वीकारते हुए कुछ जरूरी कदम उठाने चाहिए जो अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद हो।।

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