Category

Indian history

Category

वैदिक संस्कृति –

धार्मिक स्वरूप वाला वैदिक साहित्य भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे प्राचीन साहित्य है ।

वैदिक आर्यों का मूल स्थान
यूरोप – पी गाइल्ड , हर्ट , गार्डन चाइल्ड ( दक्षिणी रूस )

तिब्बत – पार्जी टर , दयानंद सरस्वती

मध्य एशिया – मैक्समूलर , जे जी रोडस

उत्तरी ध्रुव – बाल गंगाधर तिलक ( आर्कटिक होम इन दी वेदाज )

आर्यो का मूल स्थान भारत –
(1) सप्त सैंधव प्रदेश – श्री संपूर्णानंद , अविनाश चंद्र दास
(2) मुल्तान – डी एस त्रिवेदी
(3) ब्रम्हर्षि प्रदेश – गंगानाथ झा
(4) कश्मीर ,हिमालय – एल डी कल्ला
(5)वर्तमान (मध्य प्रदेश )
उत्तर प्रदेश और बिहार – राजबली पांडेय

  • ऋग्वेद में आर्य शब्द का उल्लेख 36 बार हुआ है ।

*ऋग्वेद की भाषा संस्कृत है और ईंरानी ग्रंथ अवेस्ता के साथ इसकी भाषाई समानता है ।

  • पी गाईल्ड ने हंगरी को आर्यो का मूल स्थान माना ।
  • ऋग्वेद में अश्व की चर्चा 216 बार , गाय का उल्लेख 176 व वृषभ का उल्लेख 170 बार मिलता है ।
  • मध्य एशियाई प्रभाव के कारण ऋग्वेद में बाघ तथा गेंडे का उल्लेख नहीं मिलता लेकिन हड़प्पा सभ्यता में बाघ व गेंडे दोनों का उल्लेख मिलता है ।
  • वैदिक सभ्यता ग्रंथों में वाजपे य यज्ञ का उल्लेख है जिसमें रथ दौड़ होती थी ।
  • वैदिक कालीन पहिए आरे वाले है ।वहीं हड़प्पा सभ्यता के पहिए आरे रहित है , केवल बनवाली और मीताथल में आरे वाले पहिए के प्रमाण हड़प्पन काल के है ।
  • वैदिक सभ्यता में अग्नि पूजा व पशु बलि इस सभ्यता की महत्वपूर्ण विशेषता थी ।
  • वैदिक सभ्यता अफगानिस्तान ,पाकिस्तान का उत्तर पश्चिमी सीमांत क्षेत्र , भारत पाकिस्तान का पंजाब क्षेत्र ,तथा निचली सिंधु घाटी ऋगवेदिक काल का भौतिक क्षेत्र था ।
  • सप्त सेंधव प्रदेश – सिंधु , सतलज , व्यास , रावी ,अस्कनी ,वितस्ता,सरस्वती नदियों का क्षेत्र ।
  • सम्पूर्ण वैदिक सहिंता में 31 नदियों का उल्लेख है ,ऋग्वेद में 25 नदियों का उल्लेख है । गंगा का उल्लेख एक बार व यमुना का उल्लेख तीन बार मिलता है
  • सरस्वती नदी वैदिक काल की सबसे पवित्र नदी थी । वहीं सिंधु नदी सबसे महत्वपूर्ण नदी थी ।

ऋग्वेद के नदी सूक्त में वर्णित नदियां –
सिंधु के पश्चिम में स्थित –
सरयू – हरिरुद्र
रसा – पंजशीर
कुभ – काबुल
क्रू मु – कु रम
सुवास्तु – स्वात
गोमती – गोमल

सिंधु के पूर्व में स्थिति नदियां –

  • वितस्ता – झेलम
  • अस्कीनी – चीनाब
  • परुष्नी – रावी
  • बिपाशा – व्यास
  • शतुद्री – सतलज

ऋग्वेद के नदी सूक्त में व्यास नदी का उल्लेख नहीं है इसको परीगनित नदी कहा गया है ।

  • गंडक – सदनीरा
  • वैदिक काल में हिमालय की चोटी मुजवंत सोम रस के लिए प्रसिद्ध थी ।

ऋग्वेद का 2 से 7 तक के मंडल सबसे प्राचीन है ।

नवरत्न एस राजाराम , डेविड फर्ले ऋगवेदिक काल को 6000 ई पू से 2000 ई पू के मध्य रखते है ।

मैक्समूलर के अनुसार ऋगवेदिक सहिंता का काल 1200 ई पू से 1000 ई पू के मध्य है ।।

वेदांग और धर्म सूत्रों की रचना बुद्ध काल में की गई

ऋग्वैदिक आर्य जनों में विभक्त थे , ऋग्वेद में प्राय 30 जनजाति और महत्वपूर्ण परिवारों का उल्लेख है जिनमे पांच अति प्रमुख थे

  • अनु
  • द्रू ह्यू
  • यदु
  • पुरू
  • तुर्वस

ऋग्वेद में मुखिया की गोप या गोपती कहा गया है ।

श्रम विभाजन की मूल इकाई परिवार थी ,परिवार का मुखिया कुलपा कहलाता था ।

  • ग्राम का मुखिया – ग्रामणी
  • ग्राम से बड़ी इकाई विश जिसका प्रमुख विश पति कहलाता था
  • विशो का समूह जन कहलाता था
  • देश या राज्य के लिए राष्ट्र शब्द का उल्लेख मिलता है।

दश राज्य युद्ध पुरूषणी (रावी ) नदी के किनारे हुआ था इसका उल्लेख ऋग्वेद के सातवें मंडल में हुआ है ।

दश राज्य युद्ध में पुरु के नेतृत्व में 10 कबीलों ने भरत कबीले के विरूद्ध किया

दश राज्य युद्ध में भाग लेने वाले कबीले

  • अलिन
  • पक्त
  • भलानस
  • शिव
  • विशानीन
  • अनु
  • द्रह्यू
  • यदु
  • पुरू
  • तूर्वस

इनके पुरोहित विश्वामित्र थे व भरत कबीले के पुरोहित वशिष्ठ थे ।

  • ऋग्वेद में सभा व समिति नामक दो संस्थाओं का उल्लेख है जो राजा पर नियंत्रण रखती थी ।
    सभा – महत्वपूर्ण लोगो का समूह
    समिति – सभी भाग ले सकते थे ।

आर एस शर्मा के अनुसार सभा न्यायिक कार्य कर सकती थी जो समिति नहीं कर सकती थी ।

ऋग्वेद की एक ऋचा में सभा को जुआ खेलते का जमाव कहा गया है ।

सभा को कष्ट व प्रचंड कहा गया है ।

अथर्व वेद में सभा व समिति को प्रजा पति की दो पुत्रियां कहा गया है ।

  • जिमर के अनुसार सभा ग्राम संस्था थी , व समिति सम्पूर्ण जन की केंद्रीय संस्था थी ।
  • वैदिक सभ्यता में समिति के प्रमुख को ईशान कहा गया ।
  • वैदिक सभ्यता में प्रजा की उपस्थिति में समिति राजा का निर्वाचन करती थी ।
  • संज्ञान / समज्ञान नामक देवता को जनतंत्र का देवता कहा गया है
  • डॉ जायसवाल ने सभा व समिति के अतिरिक्त एक तीसरी संस्था विदथ का उल्लेख किया है जिसका कार्य धार्मिक जीवन का प्रबंध करना था ।इसे आर्यो की प्राचीनतम संस्था माना गया है ।
  • अल्टेकर के अनुसार विदथ विद्वानों की परिषद थी ।

आर एस शर्मा के अनुसार विदथ आर्यो की प्राचीनतम जन सभा थी जिसमे स्त्री और पुरुष दोनों भाग लेते थे , सामान्यत यह लूट के धन का बंटवारा करने वाली संस्था थी ।

  • इन्द्र को विदथ की शक्ति कहा गया है ।
  • तिलक के अनुसार सत्र यज्ञ वैदिक यज्ञों में सबसे पुराना है ।
  • ओल्डनबर्ग ने अनुसार विदथ का अर्थ धर्म विधि है ।
  • आर एस शर्मा के अनुसार विदथ भारतीय आर्यों की प्राचीनतम सामुदायिक संस्था थी । जिसमें स्त्री तथा पुरुष दोनों शामिल होकर आर्थिक ,धार्मिक ,सामाजिक कार्यों का संपादन करते थे ।

ऋग्वेद की अनार्य जातियां –

  • अज
  • शिग्र
  • यजू
  • किकिट
  • पिशाच
  • सिम्यूं

अनार्य राजा –
* भेद
* शंबर
* घुनी चुमुरी
* पिप्रू

  • वैदिक काल के महत्वपूर्ण व्यक्ति – पुरोहित ,सेनानी , ग्रामणी
  • वैदिक काल में सूत , रथकार,कर्मार को रत्निन कहा जाता था।

कानून के लिए ऋग्वेद में धर्मन शब्द मिलता है ।

  • व्राज पति – गोचर भूमि का अधिकारी
  • प्रश्न विनाक – वैदिक कालीन न्यायाधीश

प्रथम बार चार स्तर पर विभाजन ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में मिला है ।

  • आर एस शर्मा के अनुसार शूद्र वर्ग में आर्य व अनार्य दोनों शामिल थे ।
  • ऋग्वेद का आठवां मंडल ऋषि मंडल कहलाता है ।

आजीवन अविवाहित रहने वाली कन्याओं को अमाजू कहा जाता था

वैदिक कालीन ऋषि स्त्रियां –
घोषा , लोपा मुद्रा ,अपाला , विश्व वारा , अर्चनाना , गौर बीती , विपशला , शची सिकता, पोलोमी , कक्षा वृती , इंद्राणी ।

वैदिक काल में स्त्री का संपति में अधिकार स्वीकार किया जाता था

ऋग्वेद में विवाह –
ऋग्वेद में एकल विवाह , बहुपत्नी विवाह , बहु पति विवाह का उल्लेख है इसके साथ ही अनुलोम विवाह व प्रतिलोम विवाह का उल्लेख है ।

ऋग्वेद में अनुलोम विवाह –
* ब्राह्मण विमद व राज कन्या का विवाह

  • अगस्त्य का विदर्भ राज कन्या लोपा मुद्रा से विवाह

प्रतीलोम विवाह –
* शुक्राचार्य की पुत्री का राजा ययाति से विवाह ।

  • महर्षि आंगिरस की पुत्री का राजा असंग से विवाह

भोजन
*आर्य मासाहारी व शाकाहारी दोनो थे

  • खीर – क्षीर पाकोदन
    *जो – यव
  • सत्तू को दही ,तिल , जो में मिलाकर करंभ नामक पदार्थ बनाया जाता था ।
  • जो कि दलिया को यवागू कहा जाता था
  • ऋग्वेद में नमक तथा मछली का उल्लेख नहीं है ।
  • बकरी व भेड़ का मांस खाया जाता था ।
  • गाय को अघन्या अर्थात न मारने योग्य कहा गया था
  • सोम व सुरा मुख्य पेय पदार्थ थे ।

*कण्व ऋषि ने सोम रस पीने के बाद अमरत्व का दावा किया है

  • घृत वंत – घी में बने मालपूए
  • मंथ – दही का बना भोज्य पदार्थ
  • उक्षान- अग्नि में पका बैल

वस्त्र – आर्यो के वस्त्र सूत , उन मृग चर्म के बनाए जाते थे ।

  • ऊनी वस्त्र का उल्लेख दसम मंडल में मिलता है ।
    गांधार क्षेत्र की भेडे उन के लिए प्रसिद्ध थी

*वैदिक काल में वस्त्र बुनने की कला उन्नत दशा में थी यह कार्य मुख्य रूप से स्त्रियों द्वारा किया जाता था।

द्रापी – युद्ध के समय पहने जाने वाला वस्त्र

उष्नीय – पगड़ी

वैदिक काल में वस्त्र प्राय तीन प्रकार के होते थे –

  • नीवी – कमर के नीचे पहने जाने वाला वस्त्र
  • वास – कमर के ऊपर पहने जाने वाला वस्त्र
  • अधिवास – ऊपर से धारण किए जाने वाला वस्त्र ।

उस्तरा – क्षुर
नाई – वाप्त्र

*कुंब / कुरीर – सिर के आभूषण

  • निष्क ग्रीव – गले का स्वर्ण हार
  • Rkm – वक्ष स्थल का आभूषण
  • खादी – कंगन

आमोद प्रमोद –
रथ दौड़ , घुड़ दौड़ ,पासा आर्यो के प्रमुख मनोरंजन के साधन थे।

अर्थव्यवस्था
आर्यों की अर्थव्यवस्था पशुपालन पर निर्भर थी । कृषि का उल्लेख बहुत कम है ।

  • ऋग्वेद में हल के लिए लांगल , शनु , फाल, सीर, शब्द प्रयुक्त किए गए है ।

ऋग्वेद में चावल का उल्लेख नहीं है ।

ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल में कृषि क्रियाओं का उल्लेख है

कुल्या – नहर
अश्म चक्र – रहट
करिष – गोबर की खाद

मुख्यत गाय विनिमय का माध्यम थी

गाय को अष्ट कर्णी कहा गया है ।

आर एस शर्मा का मत था कि ऋगवेदिक आर्य पशुपालन पर निर्भर थे।

ऋग्वेद के सूक्तों में अश्व का प्रयोग सर्वाधिक बार हुआ है ।

पणी – व्यापारी

वेक नाट – सूद खोर

ऋग्वेद में प्रमुख रूप से जिन अनार्यों का उल्लेख हुआ है वे है पणी

तक्षा – शिल्पियों का मुखिया ।
वाय – जुलाह
कर्मा र – लोहार

आर्य लौह से परिचित नहीं थे।

ऋग्वेद में चांदी का उल्लेख नहीं मिलता जबकि अथर्व वेद में चांदी का उल्लेख है

  • कुलाल – मिट्टी के बर्तन बनाने वाला।
  • भीषक – वेद्य
  • आर्य बहुदेव वादी थे उन्होंने प्रकृति का देविकरण कर दिया जैसे अग्नि देवता , जल देवता , इत्यादि

वैदिक धर्म प्रवृति मार्गी है ।

ऋग्वेद में मंदिर तथा देवताओं की प्रतिमा का कोई उल्लेख नहीं है ।

ऋग्वेद के देवताओं कि तीन श्रेणी –

  • आकाश के देवता –
    घोस ,वरुण , मित्र , सूर्य , सविट्र, पुषण ,विष्णु ,आदित्य , उषा ,अश्विन , विवस्तन ।
  • अंतरिक्ष के देवता –
    इन्द्र ,रूद्र ,वायु , यम ,प्रजापति , मरूत, इत्यादि ।
  • पृथ्वी के देवता – पृथ्वी ,अग्नि , सोम ,बृहस्पति , सरस्वती

अग्नि को अतिथि देवता के रूप में चित्रित किया गया ।

उत्तर मुगल काल –
विस्तृत मुगल साम्राज्य का औरंगजेब के बाद योग्य उतराधिकारियों के आभाव में पतन होने लगा और धीरे धीरे क्षेत्रीय राज्य स्वतंत्र सत्ता की स्थापना करने लगे ।और मुगल दरबार कई गुटों में विभाजित हो गया जैसे ईरानी गुट ,हिन्दुस्तानी गुट , इत्यादि

बहादुरशाह प्रथम
ओरंगजेब की मृत्यु के बाद 1707 ई में बहादुर शाह प्रथम उतराधिकार युद्ध में विजई हुआ और अगला बादशाह बना ।

  • बहादुरशाह कूटनीति के बल पर सभी गुटों का सहयोग पाने में सफल रहा ।
  • बहादुर शाह प्रथम के काल में आमेर के जय सिंह मारवाड़ के अजीत सिंह और मेवाड़ के अमर सिंह ने एक राजपूताना परिसंघ बनाया जिसका उद्देश्य मुगल सत्ता को समाप्त करना था ।बहादुर शाह ने इन राज्यो की स्वतंत्रता को मान्यता दे दी ।
  • बहादुर शाह ने गोविंद सिंह व जाट नेता चूड़ा मन से अच्छे संबंध स्थापित किए ।
  • सिख नेता बंदा बहादुर के विरूद्ध युद्ध करते हुए 1712 ई को बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु हो गई ।
  • इसे शाह – ए बेखबर के उपनाम से जाना जाता है
  • बहादुर शाह की मृत्यु के बाद इसके पुत्रो अजीम उस शान , रफी उस शान व जहांदार शाह में संघर्ष हुआ जिसने जहांदार शाह सफल हुआ व अगला शासक बना।

जहांदार शाह –
* 1712 ई में उतराधिकार युद्ध में विजय के बाद ईरानी दल के नेता जुल्फिकार खां के सहयोग से जहांदार शाह शासक बना ।

*जानदार शाह ने आमेर के राजा जयसिंह को महाराजा सवाई जयसिंह की पदवी दी तथा मालवा का सूबेदार बनाया।

*मारवाड़ के अजीत सिंह को महाराजा की उपाधि तथा गुजरात का सूबेदार बनाया ।

*जानदार सा ने राजस्व की इजारा व्यवस्था को प्रोत्साहन दिया ।

*जानदार शाह ने जजिया कर पर रोक लगा दी ।

  • जहां दार शाह को लंपट मूर्ख भी कहा जाता है ।

*1713 ई में जहांदार शाह के भतीजे फर्रूखसियर सेयद बंधुओं के सहयोग से बादशाह को शासन से अपदस्थ कर हत्या करवा दी।

फर्रूखसियर
फर्रूखसियर सैयद बंधुओं के सहयोग से 1713 ई में शासक बना ।

  • सैयद बंधु अब्दुल्ला व हुसैन अली क्रमशः वजीर और मीर बख्शी के पद पर नियुक्त हुए ।
  • सैयद बंधुओं ने जजिया कर समाप्त कर दिया और तीर्थ यात्रा कर को भी समाप्त कर दिया ।
  • फर्रूखसियर ने 1717 ई में अंग्रेजों को कर मुक्त व्यापार की छूट प्रदान की ।
  • फर्रूखसियर ने ही सिख नेता बंदा बहादुर को मृत्युदंड दिया ।
  • इसे कायर के नाम से भी जाना जाता है ।

*सैयद बंधुओं ने 1719 में फर्रूखसियर की हत्या करवा दी और उसके बाद रफी उद दरजात व बाद ने रफी उद दौला को गद्दी पर बैठाया इन दोनों की जल्द मृत्यु हो जाती है ।और रोशन अख्तर को मोहम्मद शाह के नाम से अगला शासक बना दिया जाता है ।

मोहम्मद शाह –
1719 ई में रोशन अख्तर मोहम्मद शाह के नाम से अगला मुगल शासक बना ।

  • मोहम्मद शाह के शासनकाल में ही नादिरशाह का आक्रमण हुआ
  • इसी के शासनकाल में मुर्शिद कुली खां ने बंगाल में सआदत खा ने अवध में व निजाम उल मुल्क ने हैदराबाद में तथा चूड़ामन व बदन सिंह ने भरतपुर में अपनी स्वतंत्रत सत्ता की स्थापना की ।
  • इसी के शासनकाल में 1737 ई में बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में मराठा ने दिल्ली पर आक्रमण किया ।
  • मोहम्मद शाह के हराम में अधिक समय बिताने तथा उसके ए संयंत विलासी आचरण के कारण इसे रंगीला भी कहा जाता है ।

अहमद शाह बहादुर –
अहमद शाह बहादुर 1748 ई में मुगल बादशाह बने

  • इन के शासनकाल में अहमद शाह अब्दाली का आक्रमण हुआ
  • अहमद शाह ने हिजड़ों के सरदार जावेद खान को नवाब बहादुर की उपाधि प्रदान की ।
  • 1754 ई मैं वजीर इमाद उल मुल्क ने माताओं के सहयोग से अहमद शाह को अपदस्थ कर आलमगीर द्वितीय को मुगल बादशाह बनाया ।

आलमगीर द्वितीय –
आलमगीर द्वितीय 1754 ई में शासक बना यह संपूर्ण काल में वजीर इमाद उल मुल्क की कठपुतली बना रहा और अंततः इमाद उल मुल्क ने आलमगीर द्वितीय की हत्या करवा दी।

  • प्लासी के युद्ध के समय दिल्ली का शासक आलमगीर द्वितीय था

शाह आलम द्वितीय –

  • आलमगीर के पुत्र अली गौर ने 1759 ई को बिहार में सालम बेटे के नाम से सिम को मुगल बादशाह घोषित किया लेकिन ये बरसों तक दिल्ली नहीं आ सका ।
  • शाह आलम द्वितीय ने 1764 ई में बंगाल के अपदस्थ नवाब मीर कासिम व अवध के नवाब शुजा उद् दौला के साथ मिलकर ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध बक्सर का युद्ध लड़ा ।
  • बक्सर के युद्ध में पराजित होने के कारण 1765 ई में शाह आलम ने अंग्रेजों के साथ इलाहाबाद की संधि की जिसके तहत वे कई वर्षों तक अंग्रेजों का पेंशनभोगी बन कर रह गया ।
  • शाह आलम द्वितीय की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र अकबर द्वितीय अगला मुगल शासक बना ।

अकबर द्वितीय –
अकबर द्वितीय 1806 ई में मुगल बादशाह बना उसे कार्यकाल तक मुगल बादशाह मात्र लाल किले तक सिमट कर रह गया ।

  • अकबर द्वितीय अंग्रेजों के शासन से बनने वाला प्रथम मुगल बादशाह था ।
  • अकबर द्वितीय ने राजा राममोहन राय को राजा की उपाधि दी ।
  • 1837 ई में अकबर जूते की मृत्यु के बाद बहादुर शाह द्वितीय अंतिम मुगल सम्राट बना ।

बहादुर शाह द्वितीय –
1837 ई में बहादुर शाह द्वितीय शासक बना ।

  • बादशाह जफर के उपनाम से शायरी लिखा करता था इसलिए इसे बहादुर शाह जफर के नाम से भी जाना जाता है ।
  • 1857 ई के संग्राम में विद्रोहियों का साथ देने के कारण अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर को रंगून निर्वासित कर दिया जहां 1862 ई में बहादुर शाह की मृत्यु हो गई और इनकी मृत्यु के पश्चात मुगल साम्राज्य का भारत में अंत हो गया ।

मुगल साम्राज्य –
फरगना मूल के बाबर ने दिल्ली सल्तनत के अंतिम शासक इब्राहिम लोदी को पराजित कर भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना की ।

बाबर –
बाबर का मूल नाम जहीरूद्दीन मोहम्मद बाबर था । बाबर ने भारत में मुगल सत्ता की स्थापना की ।

  • बाबर का जन्म 1483 ई को फरगना में हुआ ।
  • बाबर के पिता तेमूर के वंशज तथा माता मंगोल थी ।
  • बाबर अपने पिता की मृत्यु के बाद 11 वर्ष की अल्पायु में 1494 ई में शासक बना ।
  • 1504 ई में बाबर ने कबूल ,गजनी पर अधिकार कर लिया ।
  • 1507 ई में बाबर ने बादशाह की उपाधि धारण की ।

बाबर का भारत आक्रमण
बाबर के भारत आक्रमण के कई कारण थे । प्रथम तो यह की बाबर मध्य एशिया में शक्तिशाली उज़्बेक से पराजित हो रहा था इसीलिए उसने पूर्व की ओर बढ़ने का सोचा ।

  • बाबर को कबूल से मामूली आय प्राप्त होती थी जो कि पर्याप्त नहीं थी इसीलिए धन प्राप्ति हेतु बाबर ने भारत आक्रमण किया ।
  • बाबर के भारत आक्रमण के समय भारत की स्थितियां भी बाहरी आक्रमण के अनुकूल थी और बाबर को इस तरह के कई आमंत्रण भी मिल रहे थे ।

बाबर के भारत अभियान –
बाबर ने भारत में पहला अभियान युसूफजाई जाती के विरूद्ध किया और बाजोर व भेरा के किलो पर अधिकार कर लिया

पानीपत का प्रथम युद्ध –
पानीपत का प्रथम युद्ध बाबर का भारत पर पांचवा आक्रमण था । यह युद्ध अप्रैल 1526 ई को मुगल बादशाह बाबर व दिल्ली सल्तनत के शासक इब्राहिम लोदी के मध्य लड़ा गया जिसमें इब्राहिम लोदी पराजित हुआ और मारा गया परिणाम स्वरूप दिल्ली पर बाबर का अधिकार हो गया ।

  • पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर ने प्रसिद्ध तुलगमा युद्ध पद्धति का प्रयोग किया जिसे बाबर ने उज्बेको से सीखा था।
  • पानीपत के युद्ध में बाबर के तोपखाने का नेतृत्व उस्ताद अली व मुस्तफा खां ने किया ।
  • पानीपत के युद्ध में विजय के जश्न में बाबर ने प्रत्येक काबुल निवासी को एक एक चांदी का सिक्का उपहार में दिया । बाबर की इसी उदारता के कारण बाबर को कलंदर की उपाधि दी गई ।
  • पानीपत के युद्ध में विजय का कारण बाबर ने अपने धनुर्धारियों को माना ।

खानवा का युद्ध
खानवा का युद्ध मुगल बादशाह बाबर व मेवाड़ के महाराणा सांगा के मध्य मार्च 1527 ई को लड़ा गया इस युद्ध में राणा सांगा की पराजय होती है

  • खानवा युद्ध में बाबर ने गाजी की उपाधि धारण की व जिहाद का नारा दिया ।
  • खानवा के युद्ध में अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए तमग़ा कर को समाप्त कर दिया ।

बाबर के अन्य अभियान –

*1528 ई में चंदेरी का युद्ध बाबर व मालवा के शासक मेदिनी राय के मध्य हुआ जिसमें मेदिनी राय पराजित हुआ ।

  • बाबर ने घाघरा के युद्ध में 1529 ई को अफगान सेना को पराजित किया ।
  • घाघरा का युद्ध जल वे थल दोनों पर लड़ा गया ।
    इन दोनों युद्ध में विजय के बाद बाबर का भारत पर स्थायी रूप से अधिकार हो गया ।
  • दिसम्बर 1530 ई को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गई । बाबर को पहले आगरा व बाद में काबुल में दफनाया गया । अन्य तथ्य –
    बाबर को बाग लगाने का शौक था उसने आगरा में चाहर बाग शैली में ज्यामितीय बाग लगाया जिसे आराम बाग या नर्र ए अफगान कहा जाता है ।
  • बाबर ने एक नया चांदी का सिक्का शाहरुख नाम से चलाया

*बाबर ने सड़कों की माप के लिए गज ए बाबरी का शुभारंभ किया

  • बाबर ने तुर्की भाषा में अपनी आत्म कथा तुर्क ए बाबरी की रचना की ।

बाबरनामा –
बाबरनामा / तुजूक ए बाबरी

बाबरनामा मुगल शासक बाबर की आत्मकथा है जिसे सव्यं बाबर ने अपनी मातृभाषा चगताई तुर्की भाषा में लिखी । बाबरनामा से बाबर के भारत आक्रमण व यहां की भौगोलिक स्थिति के बारे में जानकारी मिलती है । आगे चलकर अकबर के काल में अब्दुर्रहीम खानखाना ने इसका फारसी अनुवाद किया तथा ब्रिटिश काल में जॉन लेईडेन ने 1810 में बाबरनामा का अंग्रेजी अनुवाद किया।
मुगलकाल के इतिहास को जानने के साथ ही विश्व इतिहास में भी बाबरनामा का साहित्यिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है ।
बाबर पहला मुगल शासक था जिसने अपनी आत्मकथा लिखी ।आत्मकथा लिखने वाला दूसरा मुगल शासक जहांगीर था
बाबर बाबरनामा में भारत के विजयनगर और मेवाड़ के हिन्दू राजाओं का उल्लेख करता है।
बाबर के लिखे हुए संस्मरणों का हिंदी अनुवाद बाबरनामा के नाम से साहित्य अकादमी ने 1974 में प्रकाशित किया था।

  • बाबर ने हुमायूं को अपना उतराधिकारी घोषित किया ।