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आधुनिक भारत का इतिहास

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बंगाल और ब्रिटिश इस्ट इंडिया कंपनी –
बंगाल मुगलकाल का एक महत्वूर्ण सूबा था । मुगल बादशाह अपने प्रतिनिधि के माध्यम से बंगाल पर शासन करते थे । जब कालांतर में इन प्रतिनिधियों को निजाम त अधिकार मिले तो इन्हे बंगाल का नवाब कहा जाने लगा जिनके पास दीवानी व फौजदारी दोनो तरह के अधिकार थे
बंगाल शुरुआत से ही एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था जो आर्थिक दृष्टि से काफी समृद्ध था मुगलों को सर्वाधिक राजस्व बंगाल से प्राप्त होता था इसी कारण बंगाल को सम्पूर्ण सम्राज्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था ।

बंगाल के प्रमुख नवाब –
मुगल बादशाह ओरंगजेब ने अपने शासन के अंतिम दिनों में मुर्शीद कुली खां को बंगाल का दीवान नियुक्त किया । 1707 ई में ओरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्पन्न स्थति का लाभ उठाकर मुर्शीद कुली खां ने खुद को 1717 ई में बंगाल का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया हालांकि मुर्शीद कुली खां ओपचारिक रूप से मुगलों की सत्ता को मानता रहा लेकिन वास्तविकता में सभी शक्तियां उसके पास ही थी ।

  • मुर्शीद कुली खां ने ढाका से मुर्शिदाबाद राजधानी स्थानांतरित की ।
  • 1726 ई में मुर्शीद कुली खां की मृत्यु के बाद उसका दामाद शुजाउद्दिन बंगाल का अगला नवाब बना जो 1739 ई तक बना रहा ।
  • शुजाउद्दिन की मृत्यु के बाद अल्प समय के लिए सत्ता मुर्शीदकुली खां के पुत्र सरफराज खां के पास आती है लेकिन सरफराज खां को बंगाल के नायब नवाब अलिवर्दी खां ने अपदस्त कर लिया और 1740 ई में खुद बंगाल का नवान बन गया ।

अलीवर्दी खां –
अलीवर्दी खां ने गिरिया के युद्ध में सरफराज खां को पराजित कर बंगाल की सत्ता प्राप्त की ।अलीवर्दी खां ने बंगाल के अंग्रेजो और फ्रांसीसियों की गतिविधियों पर अंकुश लगाया।
अलीवर्दी खां ने यूरोपियों की तुलना मधुमक्खियों से की थी और कहा था ” यदि उन्हें छेड़ा न जाए तो वे शहद देंगी और यदि छेड़ा जाए तो वे काट-काट कर मार डालेंगी” l

  • अलीवर्दी खां के कोई पुत्र नहीं था अत : उसकी मृत्यु के बाद उसकी छोटी बेटी का बेटा अर्थात अलीवर्दी खां का नाती सिराज उद दोल्ला अगला नवाब बना ।

  • सिराज उद दोल्ला-
    अली वर्दी खां की मृत्यु के बाद 1756 ई में सिराज उद दोल्ला अगला नवाब बना *सिराज उद दोल्ला के नवाब बनने के कारण मुर्शीद कुली खां की अन्य पुत्रियों व उनके पुत्रो ने इसका विरोध किया इनमें बड़ी बेटी घसीटी बेगम , दीवान रजवल्लभ , और दूसरी बेटी का पुत्र शोक त जंग प्रमुख थे ।

सिराज उद दोल्ला के अन्य विरोधी –

  • सिराज उद दोल्ला के अन्य विरोधियों में जगत सेठ , अमीन चंद राजवल्लभ ,राय दुर्लभ ,मीर जाफर का गुट प्रमुख था ।

*सिराज उद दोल्ला ने मनिहारी कि लड़ाई में शोक त जंग को1756 ई में पराजित किया।

सिराज उद दोल्ला और विदेशी कम्पनियां –

अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने बंगाल में स्थान-स्थान पर किलेबंदी शुरू कर दी थी।
*सिराजुद्दौला ने अंग्रेजो और फ्रांसीसियों को तत्काल किलेबंदी रोकने का आदेश दिया।
*फ्रांसीसियों ने तो नवाब का आदेश मानकर किलेबंदी का काम रोक दिया किन्तु अंग्रेजो ने ऐसा नहीँ किया। परिणामस्वरूप सिराजुद्दौला ने कासिम बाजार स्थित अंग्रेजो के किले पर आक्रमण कर उन्हें आत्मसमर्पण के लिए बाध्य किया। और अंग्रेजो को वहां से भागना पड़ा ।

इस दौरान एक प्रसिद्ध ब्लेक होल की घटना घटी जिसे ब्रिटिश कंपनी ने आगे विरोध का आधार बनाया ।

ब्लैक होल की घटना
20 जून, 1756 को फोर्ट विलियम ने आत्मसमर्पण कर दिया कुछ शहर छोड कर फुल्टा द्वीप भाग गए। इस दौरान पीछे बचे 146 अंग्रेजों को 18 फुट लंबे तथा 14 फुट 10 इंच चौड़े एक कमरे मेँ बंद कर दिया गया था, जिसमें से अगले दिन केवल 23 अंग्रेज ही बच पाए थे।
जून, 1756 मेँ घटी यह घटना इतिहास मेँ ब्लैक होल के नाम से जानी गई इस घटना में जीवित बचे एक अंग्रेज होलवेल ने इस घटना को प्रचारित किया और नवाब को दोषी ठहराया ।

नवाब और अलीनगर की संधि –
जनवरी 1757 ई को एडमिरल वाट सन और रोबर्ट क्लाइव ने कोलकाता के प्रशासन अमींचंद्र को रिश्वत देकर पुन: इस पर अधिकार कर लिया ।फरवरी 1757 मेँ अंग्रेजोऔर सिराजुद्दौला के बीच कोलकाता मेँ एक संधि हुई, जिसे अलीनगर की संधि के नाम से जाना जाता है।
इस संधि द्वारा अंग्रेजो ने बंगाल मेँ किलेबंदी और सिक्के ढालने की अनुमति प्राप्त की।
अलीनगर की संधि द्वारा अंग्रेज और आक्रामक हो गए। मार्च 1757 मेँ अंग्रेजो ने फ़्रांसिसी क्षेत्र चंद्रनगर पर कब्जा कर लिया।

प्लासी का युद्ध –
अंग्रेजो ने सिराजुद्दौला के विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा जिसमें सिराजुद्दौला के सेनापति मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाने का आश्वासन देकर सामिल किया गया था। इसके अतिरिक्त इस योजना में बंगाल के कई सेठ ,साहूकार व अन्य प्रमुख अधिकारी शामिल थे ।

*23 जून 1757 को अंग्रेजो और सिराजुद्दौला की सेनाओं के बीच प्लासी नामक स्थान पर एक भीषण युद्ध हुआ, जिसमें सिराजुद्दौला की हार हुई।
प्लासी के युद्ध मेँ सिराजुद्दौला की सेना का नेतृत्व मीर जाफर, लतीफ खां, राय दुर्लभ, मीर मदान और मोहन लाल कर रहे थे। इसमें मीरजाफर और राय दुर्लभ अंग्रेजो से मिले हुए थे।

प्लासी के युद्ध मेँ सिराजुद्दौला को बंदी बनाकर बाद मेँ गोली मार दी गई।

मीर जाफर –
प्लासी के युद्ध मेँ विजय के बाद अंग्रेजो ने मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाया।
नवाब बनने के बाद मीर जाफर ने पुरस्कारस्वरूप अंग्रेजो को 24 परगना की जमींदारी प्रदान की। साथ ही कंपनी को बंगाल, बिहार, और उड़ीसा मेँ मुक्त व्यापार करने का अधिकार प्रदान किया।
कालांतर मेँ मीर जाफर के अंग्रेजो से संबंध खराब हो गए। इसका कारण प्रशासनिक कार्योँ मेँ अंग्रेजो का बढ़ता हस्तक्षेप था।
अगरेजो के बढ़ते हस्तक्षेप से तंग आकर मीर जाफर अपने दामाद मीर कासिम के पक्ष मेँ नवाब का पद छोड़ दिया।

नवाब के रूप में मीर कासिम –

  • 1760 ई को अंग्रेजो के सहयोग से मीर कासिम बंगाल का नवाब बना ।नवाब बनने के बाद मीर कासिम ने अंग्रेजों को कई लाभ पहुंचाए लेकिन अंत में मीर कासिम भी अंग्रेजो कि मांगो से तंग आ गया और अवध पलायन कर गया 1763 ई को पुन: मीर कासिम की जगह मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया ।

*मीर कासिम ने नवाब बनने के बाद अंग्रेजो को मिदनापुर, बर्दवान तथा चटगांव के तीन जिले सौंप दिए।
*मीर कासिम ने राजधानी को मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित कर दिया।
“फरुखसियर के 1717 के फरमान के अनुसार कंपनी को पारगमन शुल्क से मुक्त कर दिया गया था। इस तरह की छूट कंपनी के कर्मचारियोँ के लिए नहीँ थी। कंपनी के कर्मचारियोँ द्वारा इस फरमान का दुरुपयोग किया जा रहा था। मीर कासिम ने भारतीय व्यापारियोँ के लिए भी चुंगी समाप्त कर दी।

*1765 में मीर कासिम और अंग्रेजो के बीच कई युद्ध हुए, जिसमें अंततः पराजित हुआ और भाग गया।

मीर जाफर –
*मीर जाफर ने अंग्रेजो की सेना के रखरखाव के लिए बर्दवान, मिदनापुर और चटगांव प्रदान किए तथा बंगाल मेँ उन्मुक्त व्यापार का अधिकार दिया।

*1764 में मीरजाफर ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय को मिलाकर बक्सर नामक स्थान पर अंग्रेजो से युद्ध किया इस युद्ध मेँ अंग्रेजो की विजय हुई।

*बक्सर के युद्ध मेँ के बाद बंगाल के गवर्नर लार्ड क्लाइव ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के साथ इलाहाबाद की संधि की।

*इलाहाबाद की संधि द्वारा मुग़ल सम्राट को कड़ा और इलाहाबाद का क्षेत्र मिला।
*मुग़ल सम्राट ने कंपनी को बंगाल बिहार की दीवानी का अधिकार दिया
। कंपनी ने उसके बदले 26 लाख रूपये मुग़ल सम्राट को देना स्वीकार किया।
*शुजाउद्दौला द्वारा कंपनी को युद्ध हर्जाने के रुप मेँ 50 लाख रुपए चुकाने के बाद उसके क्षेत्र पर अधिकार कर लिया गया।
5 फरवरी 1765 को मीर जाफर की मृत्यु के बाद उसके पुत्र नाजीमुद्दौला को बंगाल के नवाब बनाया गया।

द्वैध शासन -(1765 ई. से 1772 ई.)

अंग्रेजों ने बंगाल मेँ 1765 मेँ द्वैध शासन की शुरुआत की, जो 1771 ई. तक चला।

*लियो कार्टिस को द्वैध शासन का जनक माना जाता है।
द्वैध शासन के समय बंगाल से 1760-67 के बीच 2,24,67,500 रुपए की वसूली की गई। इससे पूर्व राजस्व की वसूली मात्र 80 लाख थी।
*शासन के समय बंगाल मेँ 1770 ई. मेँ भयंकर अकाल पड़ा, जिसमें करीब एक करोड़ लोगोँ की भुखमरी के कारण मृत्यु हो गई।
*1770 ई. मेँ कोर्ट डायरेक्टर्स ने बंगाल मेँ द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त करके प्रशासन का उत्तरदायित्व अपने अधिकार मेँ लेने का आदेश जारी किया।

*बंगाल का अंतिम नवाब मुबारक उद्दौला (1770 से 1775) था।

मराठा संघ –
मराठा परिसंघ का निर्माण दूसरे पेशवा बाजीराव प्रथम के शासनकाल में हुआ । वस्तुत : इस समय मराठा साम्राज्य का उत्तर व दक्षिण में अत्यधिक प्रसार हुआ इस प्रसार में मराठा सरदारों की महत्वपूर्ण भूमिका थी परिणामस्वरुप मराठा साम्राज्य के बड़े बड़े क्षेत्र इन सरदारों के अधीन कर दिए गए जो इस प्रकार है –

होलकर इंदौर
गायकवाड़ बड़ौदा
भोंसलेनागपुर
सिंधिया ग्वालियर

जिन मराठा सरदारों को बड़े बड़े क्षेत्र प्रदान लिए गए इन्हीं सरदारों को संगठित कर मराठा परिसंघ का निर्माण किया गया और पेशवा इस परिसंघ का प्रधान बना। आगे चलकर पेशवा पूर्णत इन सरदारों पर निर्भर हो गया और पेशवा नाम मात्र का प्रधान रह गया मराठा संघ के-

मराठा परिसंघ के नेता
रघुजी भोसले
रानोजी शिंदे
मल्हार राव होलकर
दाभाजी गायकवाड़
  • इन नेताओं ने मिलकर मराठासंघ का निर्माण किया।
  • बाजीराव प्रथम (1720-40 ई.) तथा उसके पुत्र बालाजी बाजीराव (1740-61 ई.) के शासनकाल में इस संघ पर पेशवा का कड़ा नियंत्रण रहा।
  • पेशवा बालाजी बाजीराव की मृत्यु हो जाने तथा उसके बाद पेशवाई के लिए होने वाले उत्तराधिकार युद्ध के कारण मराठा संघ के महत्त्वकांक्षी सरदारों पर पेशवा का नियंत्रण ढीला पड़ गया।
  • फलस्वरूप मराठा संघ मराठा राज्य के विघटन का एक प्रमुख कारण बन गया।
  • मराठा संघ के सरदारों के आपसी द्वेष तथा उनकी प्रतिद्वन्द्विता के कारण, विशेषरूप से होल्कर तथा शिन्दे की प्रतिद्वन्द्विता के कारण, उनके लिए संयुक्त होकर कार्य करना असंभव हो गया।
  • यह मराठा साम्राज्य, स्वतंत्रता के ह्रास तथा पतन का मुख्य कारण बना।

मराठा पेशवाओं की सूची –
बालाजी विश्वनाथ को प्रथम पेशवा के नाम से जाना जाता है बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद इनके पुत्र बाजीराव प्रथम मराठा पेशवा बनते है इस तरह पेशवा का पद पैतृक बन जाता है और समस्त शक्ति पेशवा के हाथो में आ जाती है और पूना पेशवा का केंद्र बनता है ।


प्रमुख मराठा पेशवाओं की सूची निम्न प्रकार है

बालाजी विश्वनाथ1713 ई से 1720 ई
बाजीराव प्रथम1720 ई से 1740 ई
बालाजी बाजीराव1740 ई से 1761 ई
माधवराव 1761 से 1772 ई
नारायण राव1772 से 1773 ई
माधव नारायण 1774 से 1795 ई
बाजीराव द्वितीय1796 से 1818

इलाहाबाद की दूसरी संधि-
प्लासी के युद्ध में हार के बाद अंग्रेजो ने अवध के नवाब शुजाउदौला के सााथ इलाहाबाद की दूसरी संधि हुई जो इस प्रकार है –

सन्16 अगस्त 1765 ई
संधि कर्ताक्लाइव व अवध के नवाब

इलाहाबाद की दूसरी संधि की शर्तें-

  • अवध का राज्य कड़ा और इलाहाबाद को छोड़कर नवाब को वापस दे दिया गया ।
  • कंपनी को पच्चास हजार रु व चुनार का दुर्ग प्राप्त हुए ।
  • कंपनी को अवध में कर मुक्त व्यापार करने की सुविधा प्राप्त हुई ।